22/03/2026 10:23 AM
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कुड़मि जन्मजात आदिवासी है हेमंत जी । आप तो मुख्यमंत्री रहे और हैं , आपको समय निकाल कर कभी जानकारी भी लेना चाहिए।

कुड़मि जन्मजात आदिवासी है हेमंत जी । आप तो मुख्यमंत्री रहे और हैं , आपको समय निकाल कर कभी जानकारी भी लेना चाहिए।

 

आप खुद आदिवासी हैं पता करिये की किस आधार पर आप अनुसूचित जनजाति में शामिल किये गये हैं। 

 

देखिए पढ़िये आदिवासी के बारे में और कुड़मि के बारे में:- 

 

सीएनटी एक्ट छोटानागपुर के सभी आदिवासी समुदाय पर लागू है कुड़मि समुदाय को शुरुआत से इसका अंश बनाया गया है।

 

भारतीय विवाह और उत्तराधिकार अधिनियम 1865 संशोधन से संबंधित भारत सरकार का आदेश 1913 और इसी के आधार पर एकीकृत उड़ीसा बिहार का 1931 का नोटिफिकेशन जिसमें चिन्हित आदिवासी समुदाय के रूप में कुड़मि, संथाल, मुंडा आदि 13 समुदाय को उक्त अधिनियम से मुक्त रखा गया है‌।

 

1931 का सेंशस रिपोर्ट।

 

उपरोक्त तीनों आदेश के आधार पर हेमंत जी आप और बांकी आदिवासी सभी अनुसूचित जनजाति में शामिल किये गये हैं जिसमें कुड़मि भी है लेकिन कुड़मि को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने से छोड़ दिया गया है बिना कारण बताए।

 

अब ये भी जान ही लीजिए कुड़मि के संबंध में:- 

 

1950 में अनुसूचित जनजाति की प्रथम सुची में कुछ प्रीमिटीब ट्राइब ( आदिवासी) को अनुसूचित जनजाति में शामिल किये जाने से छुट जाने संबंधी अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के पत्राचार पर सांसद हृदयनाथ कुंजरू जी को दिया गया पं नेहरू जी का जवाब , जिसमें भारत सरकार ने कहा कि जो छुट गये हैं उन्हें राज्य के अनुशंसा पर सुधार कर लिया जायेगा। और उस समय से कुड़मि समुदाय प्रयासरत है।

 

पी ओ बोर्डिंग जी का संथाल परगना गजेटियर जिसमें साफ लिखा है कि कुड़मि संथाल मुंडा आदि सभी खेरवाल वंश से ताल्लुक रखते हैं।

 

एच एच रिजले जी का कुड़मि के संबंध में जारी किया रिपोर्ट जो बताता है कि छोटानागपुर पठारी क्षेत्र के कुड़मि पूरे भारत के कुर्मी से बिल्कुल भिन्न है और यहां के आदिवासी हैं इनका जन्म जीवन शादि विवाह मृत्यु के अपने संस्कार हैं। अपना भाषा संस्कार संस्कृति है।

 

जी ए ग्रियर्सन जी का भाषा सर्वेक्षण रिपोर्ट जिसमें साफ बताया गया है कि छोटानागपुर पठारी भु भाग का कुड़मालि भाषी क्षेत्र है जो कुड़मि की मातृभाषा है ये सर्वविदित भी है।

 

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर एकीकृत बिहार में पिछड़ा वर्ग को दो भाग में विभक्त कर झारखंड के कुरमी (महतो) यानि कुड़मि को एनक्सर १ में कर विशेष संरक्षण दिया और बांकी कुर्मी को एनक्सर २ में रखा।

 

एंथ्रोपोलॉजिक सर्वे आफ इंडिया के बिहार (झारखंड) एडिशन समेत पश्चिम बंगाल एडिशन व उड़ीसा एडिशन में आदिवासी KURMI(आई के नीचे डाट वाला) जिसे हार्ड आर से उच्चारित करने वाला और बांकी गैर-आदिवासी KURMI जिसके आर को सोफ्ट आर के रूप में उच्चारित करने का बात रिजले साहब ने किया था इनके अंतर को स्पष्ट करते हुए आदिवासी KURMI को KUDMI डिक्लेयर किया और गैर-आदिवासी KURMI को यथावत रखा।

 

तदनुसार झारखंड सरकार ने एनक्सर १ वाले कुरमी को जाति प्रमाण पत्र निर्गत करने संबंधी एक अलग संकल्प पारित कर ” कुरमी ” को विलोपित कर उसके स्थान पर “कुरमी महतो / कुड़मी” किया गया है।

 

उपरोक्त सारे सरकारी दस्तावेजों के अलावा दर्जनों रिसर्च और विद्वानों के आलेख मौजूद हैं जो कुड़मि समुदाय को आदिवासी प्रमाणित करते हैं और अनुसूचित जनजाति में शामिल होना चाहिए बताते हैं।

 

कुड़मि के लिए अनुसूचित जनजाति की मांग को सिर्फ आरक्षण आदि लाभ से जोड़कर देखना गलत है। अनुसूचित जनजाति का स्टेटस कुड़मि समुदाय की वास्तविक पहचान को स्थापित करने से संबंधित है और समुदाय के लिए इस नाते ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए ये कह कर कुड़मि को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग को दरकिनार करना कि आदिवासी खुद दिक्कत में है कहीं से उचित प्रतीत नहीं होता है। संबंधित मांग पर सदन में आपका टिप्पणी आपका दिमागी दिवालियापन दर्शाता है और संविधान में निहित आदिवासी अधिकार के विरुद्ध है। मैं और मेरे समाज को और आदिवासी शुभचिंतकों को नागवार गुजरा है।

 

श्री मान जिस तरह से प्रतिक्रिया देते हुए आपने सरना कोड नहीं मिल पाने को अपने लिए और अनुसूचित जनजाति में शामिल समुदायों के लिए दुखदाई बताया है इससे ऐसा लगता है जैसे कि सरना कोड सिर्फ आपका है या आपके समुदाय या अनुसूचित जनजाति में शामिल समुदायों का ही है। हम कुड़मि समुदाय का नहीं है या हम कुड़मि समुदाय सरना कोड के लिए संघर्षरत नहीं है। सरना (आदिवासी धर्म) हम कुड़मियों का भी धर्म है , हम कुड़मि आपसे कम प्रकृति पूजक नहीं हैं। हमारे भी अपने प्रकृति आधारित धार्मिक संस्कार हैं। 12 महीने का 13 परब है अखायन जात्रा से साल का आरंभ कर पुस परब( टुसू) में साल का अंत होता है। हमारा अपना ग्राम महतो स्वशासन व्यवस्था है । जन्म जीवन विवाह मृत्यु के अपने संस्कार हैं। कुड़मालि अपनी हमारी मातृभाषा है। हमारे अपने टोटेम हैं और टोटेमिक समाजिक ढांचा में अपने टोटेम के नियम हैं। हमारी शैक्षणिक आर्थिक स्थिति दिन ब दिन बदतर होती जा रही है इसके कारण हमारे भाषा संस्कृति संस्कार नेग नेगाचार जीवन शैली प्रभावित हो रही है और संविधान में निहित समानता के अवसर के पैमाने पर भी फिसलते जा रहे हैं 99 प्रतिशत कुड़मि को लाख पचास हजार का जरुरत पड़े तो बिना कर्ज या जमीन बेचे आर्थिक जरुरत पूरी नहीं कर पाते हैं। कुड़मि की स्थिति दिन ब दिन बदतर होती जा रही है। कृषि आधारित जीवन शैली वाला आदिवासी समुदाय होने के कारण जमीन का विस्थापन और भुमि बंटवारा से आर्थिक श्रोत समाप्त सा होकर मजदूरी और पलायन पर आश्रित जीवन जीने को मजबूर हैं।

 

अगर आप या अन्य अनुसूचित जनजाति में शामिल समुदाय ये सोचते हैं कि हमारी भाषा संस्कृति संस्कार नेग नेगाचार आप सबों से भिन्न है तो ये भिन्न होना स्वाभाविक है क्योंकि हम अलग कबीला के वंशज हैं हमारा मानवीय सभ्यता खुद का अपना है जो हमारे कुड़मि पूर्वजों ने बनाया है जिसे आज भी हर कुड़मि घर अपने आंगन में भुतपीढ़ा के रूप में पुजते हैं और आज भी हमारा कोई मृत्यु प्राप्त करता है तो उसके अंश को भुतपीढ़ा में अपने पूर्वजों संग स्थापित कर जन्म-जन्मांतर के लिए रखते हैं और पुजते हैं। साथ ही हम झारखंड (छोटानागपुर पठार) में आपसे या अन्य आदिवासियों से भी ज्यादा आदिम हैं। अगर सही तरीके से खोज हो तो झारखंड के पहाड़िया ( मालतो) और कुड़मि ( महतो) ही शुरुआती मानवीय सभ्यता यहां के हैं इसके वैज्ञानिक तथ्य भी उजागर होंगे। यह बात आनंद मार्ग के संस्थापक और समाजिक चिंतकों ने भी अपने विचारों में लिखा है। बहुत सारे रिसर्चर भी इसे प्रमाणित किया है।

 

माननीय मुख्यमंत्री महोदय आदिवासी कुड़मि समुदाय आदिवासी था है और रहेगा । कुड़मि समुदाय विश्व के अन्य आदि मानव सभ्यता की तरह एक विशिष्ट आदि मानव सभ्यता है जिसका अपना स्वतंत्र स्तित्व आदिकाल से है । अनुसूचित जनजाति का स्टेटस इस समुदाय का अधिकार है जो लेके रहेंगे क्योंकि भारत का संविधान में ये अधिकार कुड़मि समुदाय को देके रखा है। आपसे आग्रह होगा कि आप सच्चे और सैद्धांतिक राजनीति को अपनायें जो झारखंड के मुख्यमंत्री में होने चाहिए वरना कुर्सी ही आपको रिजेक्ट कर देगी क्योंकि मुख्यमंत्री का कुर्सी उसीका होगा जो न्यायप्रिय नेता होगा।

@संजीव कुमार महतो, केंद्रीय सचिव आजसू पार्टी व संयोजक अखिल भारतीय आदिवासी कुड़मि महासभा एवं निदेशक हूल फाऊंडेशन।

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